1990 -2016 GURUJI KI RAchna krishna  RADHA  BHAGWAD GITA IN FULL HINDI - VRINDAVAN BHAKTI POEMS ISCKON SERIVE TO DEVOTEES
A ROMANTIC CULTURED KATHAK POET OF HER GENERATION GURU IS RENOWNED FOR HER PERFORMANCES ON KATHAK THUMRIS VANDANAS TAAL PERFORMANCES 
THE POEMS ARE BASED ON KRISHNAS VRINDAVAN  AND EMOTIONS THAT POET FEELS 


अली शाह ठुमरीस गतनिकस और राधा Krishna रासलीला के कामुक स्मरक अक्षरों
पनघट की गत मुरली गत नटवारी गत कृष्णा जैसे राधा को छेड़ छाड़ अपने दरबार में जलसा अक्सर सजाते थे 
नायिका के अनेक प्रकार-एक भाव 
 स्वाधीनपतिक -विप्रलब्धा -वहन्दीत - परोशीपोटीक - विराहोत्कंठिता - 
अभिसारिका - जैसे नायिका अपने प्रियतम से मिलने जाती हैं वो रास्ते में समस्याएँ को मुकाबला(गर्जन और बिजली) करती हैं वो अपने स्वामी के लिए इंतज़ार करती हैं पर जैसे नटखट कान्हा की चतुराई वो गोपियो से छुपते हैं और राधा निराश हो जाती हैं की कृष्णा कभी नहीं आएंगे वो चलेगये पर्देश -

स्थापत्य वैभव लखनऊ रईस गतिविधियों समृद्धि व्याप्ति बड़प्पन नियंत्रित महान धन के एक जीवन विलासिता और फुरसत गतिविधियों के लिए समर्पित कर दिया। रासलीला नाचत रास बिहारत नचावत हैं ब्रज नगरी के सब नारी -ता दा नी ता नी धानी तत तात थे .लखनऊ घराना रईस नवाब ऑफ़ औध वाजिद अली शाह की संतलत रासधारी परंपरा निखरा मथुरा और ब्रज नगरी में लखनऊ की सरज़मीन नवाबो की संतालत मुझरे और पतंग उड़ाने की रस्मे वही पर मैंने काफी साल गुज़ारे और कोल्कता में जनि बेगम और मेटियाबुरजिस हमारा रिश्तेदार भी रह चुके 
डिफरेंट आस्पेक्ट्स ऑफ़ नायिका इन कत्थक -स्थापत्य वैभव लखनऊ रईस गतिविधियों समृद्धि व्याप्ति बड़प्पन नियंत्रित महान धन के एक जीवन विलासिता और फुरसत गतिविधियों के लिए समर्पित कर दिया। रासलीला नाचत रास बिहारत नचावत हैं ब्रज नगरी के सब नारी -ता दा नी ता नी धानी तत तात थे .लखनऊ घराना रईस नवाब ऑफ़ औध वाजिद अली शाह की संतलत रासधारी परंपरा निखरा मथुरा और ब्रज नगरी में लखनऊ की सरज़मीन नवाबो की संतालत मुझरे और पतंग उड़ाने की रस्मे 

(वही पर मैंने काफी साल गुज़ारे और कोल्कता में जानी बेगम और मेटियाबुरजिस हमारा रिश्तेदार भी रह चुके ).

1.नाटक संगीत और नृत्य सभी प्रकार के कलाकार कत्थक भरतनाट्यम मणिपुरी ओरडीसी प्रत्येक नृत्य शैली की पृष्ठभूमि का चित्रण के माध्यम से आठ शास्त्रीय नृत्यों -Mohiniyattam, सत्त्रिया नृत्य की अनूठी प्रस्तुतिभारतीय ऐतिहासिक प्रतिनिधित्व अभिनय हैं . इसके ४ भाग अंगिका वाचिक आहार्य सात्त्विक . नाट्यशास्त्र भाव रास अभिनय के दो महत्वपूर्ण भाग हैं .राजा भाग्यचंद्र जो श्री Krishna के भक्त थे उनकी दृष्टि जो श्री कृष्णा के लिए use महारास वसंत रास और कुञ्ज रास उभरना लगा.  

2-कुंजत कोकिल श्यामा पि पि झींसी और मधुर परिपूर्णता द्वारा उदास रात भारी पड़ पथ चांदनी रात की रहस्यमय सुंदरता का मौसम कहीं देश को एक सपने की तरह साँस लेने के लिए चाँद खड़ा था और वहाँ एक सुंदर धारा बगल में बुना लाश के ऊपर clomb छायादार पाइन धुंध और परिपक्व सूरज की मधुर परिपूर्णता बंद छाती दोस्त के मौसम परिपक्व कुटीर पेड़ गर्मियों मोड़ करने के लिए उनकी चिपचिपा कोशिकाओं कुटीर पेड़ गुठली के साथ मोटा नवोदित गोले मधुमक्खियों के लिए अधिक देशी बादलों नवोदित सुंदर निगल पक्षी चहचहाना नील गगन में -राधा कृष्णा रास सखियाँ एक दुसरे से ईर्ष्या से जलती गयी स्री कृष्णा का आगमनसूंदर आत्मा पवित्र अनेक रंग बिरंगी जैसे होली मनुष्य की परिकल्पना आँसू खाली और उजाड़ सूरज की विशाल घाटी मंदकी मधुर बासुरी मन विचलित आनन्दित कीर्ति

बाँसुरीवाला की मधुर मीठी बासुरी की सुरीली तान मन में मचाई शोर
बांसुरी वाला आज भी क्या तुम अपनी बासुरी से ब्रज में मचाओगे शोर ?
कान्हा मुरली मनोहर की मधुर बासुरी से ब्रजनगरी की 
सुन्दर अनोखी सखियाँ प्रेम की गहराइयों में डूब गयी 
कामदेव का तीर भी जहाँ तक नहीं पहुंच पाह बस वही राह तक 
पीले पीताम्बर ओरे लाल नील हरे रंग बिरंगे चूड़ियाँ की झंकार चल ऋ सखी आज ब्रजनगरी में महामेला की सजावट देखे
फूलों से सजी रंगमंच दर्शक मनमोहक लालसा पिपासा
कृष्णा राधा एक संग नाचेंगे ठुमरी गाएगे प्रदर्शन प्रतिबिम्ब 

3-मुझ्र की दरबार पैरो में पैजनिया सलाम अदब
घुँघरू की झनकार चांदनी पायल ने मचाई शोर
घुँघरू की झंकार से गूँज उठा सावन भादो घनघोर
ताल पैरो की पैजनियां इत नटखट श्याम की भक्ति उत राधिका की चाल
पैरो में गंठ बंधाया नृत्यकि पालटा पलटी
ब्रज गोपियों के साथ अनेक लीलाएँ की हैं नील पंखुरी मयूर के नाचत कृष्णा राधिका "श्री लाडली लाल की जय "
परम सुदेस कंठ के हरि नख,बिच बिच बज्र प्रवाल
ब्रज में रास रच्यो मच्यो शोर सब ब्रजवासी मन में भीमोर गरज्यो मृदंग घनघोर 
 ताऊ थुंगा ताकिटे थुंगा - ताऊ थुंगा ताकिटे थुंगा आपात झपट जहाज झरकत छीने 
ज्यों चितई परनारि, सुने पातक-प्रपंच घर-घरके।त्यों न साधु, सुरसरि-तरंग-निर्मल गुनगुन रघुबरके।
करनि पहुंचियां, पग पैजनिया,रज-रंजित पटपीत
मैं रोशनी हूँ, मुझे बांध नहीं पाओगे।
ऐ अंधेरों मुझे कब तलक छुपाओगे।
काले बादलों में बन विद्युत दिख ही जाऊँगी।

4-सखी,

शाम ऐ महफ़िल एक जाम -प्यार के देवता मैं तीनों लोकों की चमक भगवान हे तुमको पूजा करते बैठते
प्यार के देवता एक इच्छा का मज़ा लेते हैं नहीं कर सकते हैं 
कामदेव ने अपनी तिर से मुझे घायल किया 
जैसा खिड़की खोल कर देखि तो श्याम की परछाई 
हँसीन रात के दरमियान फूलो का बागान शगुफ्ता ऐ गुल गुलशन 
दिल के दहलीज़ पर लिखा नटवारी श्याम राधे का नाम 
अरे मउझे कोई वहम नो नहीं यह सपना या हकीकत हैं राधे राधे !
सवारियां आज आयो श्याम हाथो में पेहेन रंग बिरंगी चुरिया  
गले में पेहेन मोतियन माल नथ वे सर सिर छोटी गुदावे मोरा सइयाँ
सताओ न मोरी अटरिया भरण जात सुन्दर लागी गुजरिया  
वृन्दावन सखियों का डेरा सारे गांव में एक नौका पानी 
सखियाँ मायूस कान्हा के इंतज़ार में श्रृंगार कर baidhi  
कोई नूर ऐ आलम तो कोई मुमताज़ महल 
 खूबसूरती का नमूना ताल लाया सुर गीत गुनगुनावे  
जैसे कान्हा का आगमन चहु दिशा अलौकिक उज्जवल दीया
"कान्हा में तोहसे हारी अब छेड़ो नाही मोरी डगरिया 
बइयाँ पड़क मेरी मटकी फोड़ी, बिखर गया मेरा दही मठा।
सास ससुर मोहे बुरी बतावे, नणदल बोलत बचन खटा।
सखियन में मेरा मान घटा।घुँघरवाले बाल श्याम के, मानो जैसे इन्द्र घटा।

शम्मा ऐ मैहर वो तबदीली ऐ मौसम एक मीठी नज़्म गुनगुनायी 
दर्द सहते ज़माना गुजर गया आप न आये शम्मा बीती सावरिया 
पिया बन गयी बावरिया ये शाम ऐ -महफ़िल तेरी रुसवाई तन्हाई 
न कोई गिला शिख्वा यह कौन है जो मुझे राधे राधे कर सताता है 
कही श्याम की परछाई तो नहीं ? 

NAYIKA RADHE -राधे राधे 
तबस्सुम ए गुल गुलशन गुलफाम तेरे ग
म ऐ जुदाई की फितरत ज़िंदादिली छाई 
न कोई गिला न शिकवा बस उल्फत एक प्रेम भरी नज़्म सुनायी 
कृष्णा राधा की जोड़ी सरेआम महफ़िल में गुनगुनायी 
पिया के नाच से गूँज उठा सावण बदरवा 

ब्रज की नायिका के रूप अपार निर्मल कोमल चंचल भती मोहोब्बत जैसी
लाल गुलाबी गुलाब का फूल बिखरे पतझर के भीतर 
निर्मल काटो से भरी आज लिख बैठी एक पाती अपने पिया को
गमक उठी सोंधी-सोंधी महकती धराशोभित ओस-बिन्दु,सजल नयन सम
प्रात: मृदुल किरणों का सुनहरी अबीर ले राधा रानी दे दो अपनी तनिक सी चरण-रज।
झंझावातों से जब हो रहा जीवन अशांत अंधकार में बुझता आस-दीप,मन क्लांत
ब्रज की नायिका कदमभ के वृक्ष संध्या पूजा की थाली माला गूंती ख्यालो में मग्न 
ब्रज की नायिका अनेक रंग बिरंगी घाघरा चोली अंगुढन चुंधियाना
ब्रज की नारी सोना हीरा चांदनी गहने बॉक्स गले में पहने मोतियन माल 
ब्रज की नायिका मोहोब्बत ख्याल गुफ्तगू पी के बारे में कर रही हैं मुझसे
बुद्धि शांति दिव्या रुपी शक्तिशाली माँ जगदम्बे जैसी प्रवीणता
ब्रज की नायिका बालों में बाल रोटी ,चंदन केसर मुखर पर मुस्कान बैठी मग्न 
ब्रज की नायिका सरस्वती, गंगा, तुलसी तुम दिव्यशक्ति सब भाँति अनूप अनेक रूप 
ब्रज की नायिका स्वाहा, स्वधा, षष्ठी दक्षिणा, मनसा, पुष्टि, तुष्टि हो स्वस्ति।
करुणा-सुधामयी देवी! तुम परम मनस्विनि, अमित उदार।
राधा-रूप-चरण-रज दे निज करो तुरंत कृपा-विस्तार
मूलप्रकृति राधा तुम, दुर्गा, लक्ष्मी, शुभ सावित्रीरूप।
भाव-विभोर,दृग-अश्रु-बिंदु,अलौकिक प्रकाश महिमा अपार निहित तुम्हारी चरण-रज

वृन्दावन के सुन्दर उपवन में फूल दरख़्त का बागीचा फूलो में काटो का चुभन 
लाल गुलाब का फूल दरख़्त पेड़ पौधे कभी खिखिलाना और मुरझाना प्रातःकाल एक ताज़ी खुशबू गुलाल हैं तेरे मन में बसे - - -राधे रानी तेरी जोड़ी खूब - - -
आली रे म्हाँरे नैनन बान पड़ी।चित्त चढ़ी म्हाँरे माधुरी मूरत हिय बिच आन गड़ी।
कब की ठाढ़ी पंथ निहारूँ अपने भवन खड़ी।अटक्या प्राण साँवरी सूरत जीवन मूल जड़ी।राधे चली यमुना तट गगरी भर कुवे के पास 

श्यामसुंदर के नाच से बादल गरजा और मचाए शोर 
तन मन का मोर नाचा पायल की पैजनियाँ की झंकार 
असवारी के मन में व्याकुलता प्रेमिका अपने प्रियतम को पुकारी …….
महाभाव-रसराज-सिरोमनि दोऊ प्यारी-प्यारे पिया पुकारी मोहोब्बत की दो पंक्तियां लिख दो
नित्य गायें चराने जाते हो, जो सदा मुरली निनाद से मुखरित रहता है, उस वन में निभृत निकुंजो में जो सर्वथा अँखियाँ खोलो रिम झिम टिप टिप बरसे मोरनी पंखुरी खोल नाची चितचोर बिजली की चमक गरजा घनगोर बदरवा

मुखर के ऊपर सुनहरा घूँघट शरमाई जैसे हिरणी शकुन्तला 
कुंदन चन्दन कुमकुम झुमका मणि बाला गले में पहन मोतियन माल  
छेड़ करत नित नन्द के नंदन स्याम राधिका युगल जोड़ी 
नन्द के नंदन की भक्ति की अभिलाषा मनोकामना ह्रदय में प्रफुल्लित 
 झूला झूलत मोरा सैयां , बासुरी बजावत वीणा की मधुर तान
आज लिख बैड पिया को प्रेम पाती डाक आकर लेगया पिया के घर  
गोपियाँ कब तक श्याम सूंदर को पुकारती जाएगी ?

राधा रुक्मिणी गोपीयों के मन में भक्ति व्याकुलता और ईर्ष्या राधा न कर अपना जिया उदास चातक का मन भी भीगा भीगा सखी राधा वंशी को सौत अपनी।
इसकी मर्मस्पर्शी धुन में,क्या नहीं सुनती तू अपने मन की प्रतिध्वनि।
राधा के गहन अंतर्मन में छिपा सम्पूर्ण प्रेम वंशी की मनमोहनी हृदय-विदीर्ण स्वर लहरी अनोखा प्रेम।कोई भेद नहीं, त्रय ऐकौवंशी वंशी राधा राधा पुकारती पपीहे की पीहू पीहू मन से न हारसर्वत्र सृष्टि में तुम ही तुम हो दोनों
नहीं द्वै नहीं एक, एकाकारद्वै में एक, गूँजेगी सर्वत्र
वंशी में समाहित, राधा तेरी ही पुकार।यामिनि एक रसमय

बरसने में राधिका प्यारी अम्बुवा की डाली
श्याम सावला राधिका गोरी युगल छवि में बलिहारी
वृंदावन ,गोकुल ,मथुरा कोई नगरीय न छोर
॥सूर्य की किरणों की आकृतियाँ निर्मल; कोमल चंचल पवन घनघोर छटा
मौन भाव चीन्हहिं कान्हा जब लखि राधिका कान्हा को प्रथम बार
द्रवित ह्रदय में छिपे तरल विचार सलज्ज दृगों में तैरने लगे बारंबा
देवदारबहुल पहाड़ बौछार के पीछे चाँद की किरणो
किधौं मुख कमल ये कमला की ज्योति होति,
किधौं चारु मुख चंद चंदिका चुराई है।

किधौं मृग लोचनि मरीचिका मरीचि किधौं,
रूप की रुचिर रुचि सुचि सों दुराई है॥
सौरभ की सोभा की दसन घन दामिनि की,
'केसव' चतुर चित ही की चतुराई है।
ऐरी गोरी भोरी तेरी थोरी-थोरी हाँसी मेरे,
मोहन की मोहिनी की गिरा की गुराई है॥
चाँद देखू या चित्तचोर देखूँ
नैनं मेँ समाया सारा जहाँ राधा
तुझसे ही प्रेम का मान राधा
तू ही बता राधा किस ओर देखूँ
​NAYIKA RADHA 
 ब्रज की नायिका 
ब्रज की नायिका के रूप अपार निर्मल कोमल चंचल भती मोहोब्बत जैसी
लाल गुलाबी गुलाब का फूल बिखरे पतझर के भीतर 
निर्मल काटो से भरी आज लिख बैठी एक पाती अपने पिया को
गमक उठी सोंधी-सोंधी महकती धराशोभित ओस-बिन्दु,सजल नयन सम
प्रात: मृदुल किरणों का सुनहरी अबीर ले राधा रानी दे दो अपनी तनिक सी चरण-रज।
झंझावातों से जब हो रहा जीवन अशांत अंधकार में बुझता आस-दीप,मन क्लांत
ब्रज की नायिका कदमभ के वृक्ष संध्या पूजा की थाली माला गूंती ख्यालो में मग्न 
ब्रज की नायिका अनेक रंग बिरंगी घाघरा चोली अंगुढन चुंधियाना
ब्रज की नारी सोना हीरा चांदनी गहने बॉक्स गले में पहने मोतियन माल 
ब्रज की नायिका मोहोब्बत ख्याल गुफ्तगू पी के बारे में कर रही हैं मुझसे
बुद्धि शांति दिव्या रुपी शक्तिशाली माँ जगदम्बे जैसी प्रवीणता
ब्रज की नायिका बालों में बाल रोटी ,चंदन केसर मुखर पर मुस्कान बैठी मग्न 
ब्रज की नायिका सरस्वती, गंगा, तुलसी तुम दिव्यशक्ति सब भाँति अनूप अनेक रूप 
ब्रज की नायिका स्वाहा, स्वधा, षष्ठी दक्षिणा, मनसा, पुष्टि, तुष्टि हो स्वस्ति।
करुणा-सुधामयी देवी! तुम परम मनस्विनि, अमित उदार।
राधा-रूप-चरण-रज दे निज करो तुरंत कृपा-विस्तार
मूलप्रकृति राधा तुम, दुर्गा, लक्ष्मी, शुभ सावित्रीरूप।
भाव-विभोर,दृग-अश्रु-बिंदु,अलौकिक प्रकाश महिमा अपार निहित तुम्हारी चरण-रज

वृन्दावन के सुन्दर उपवन में फूल दरख़्त का बागीचा फूलो में काटो का चुभन 
लाल गुलाब का फूल दरख़्त पेड़ पौधे कभी खिखिलाना और मुरझाना प्रातःकाल एक ताज़ी खुशबू गुलाल हैं तेरे मन में बसे - - -राधे रानी तेरी जोड़ी खूब - - -
आली रे म्हाँरे नैनन बान पड़ी।चित्त चढ़ी म्हाँरे माधुरी मूरत हिय बिच आन गड़ी।
कब की ठाढ़ी पंथ निहारूँ अपने भवन खड़ी।अटक्या प्राण साँवरी सूरत जीवन मूल जड़ी।राधे चली यमुना तट गगरी भर कुवे के पास 

श्यामसुंदर के नाच से बादल गरजा और मचाए शोर 
तन मन का मोर नाचा पायल की पैजनियाँ की झंकार 
असवारी के मन में व्याकुलता प्रेमिका अपने प्रियतम को पुकारी …….
महाभाव-रसराज-सिरोमनि दोऊ प्यारी-प्यारे पिया पुकारी मोहोब्बत की दो पंक्तियां लिख दो
नित्य गायें चराने जाते हो, जो सदा मुरली निनाद से मुखरित रहता है, उस वन में निभृत निकुंजो में जो सर्वथा अँखियाँ खोलो रिम झिम टिप टिप बरसे मोरनी पंखुरी खोल नाची चितचोर बिजली की चमक गरजा घनगोर बदरवा

मुखर के ऊपर सुनहरा घूँघट शरमाई जैसे हिरणी शकुन्तला 
कुंदन चन्दन कुमकुम झुमका मणि बाला गले में पहन मोतियन माल  
छेड़ करत नित नन्द के नंदन स्याम राधिका युगल जोड़ी 
नन्द के नंदन की भक्ति की अभिलाषा मनोकामना ह्रदय में प्रफुल्लित 
 झूला झूलत मोरा सैयां , बासुरी बजावत वीणा की मधुर तान
आज लिख बैड पिया को प्रेम पाती डाक आकर लेगया पिया के घर  
गोपियाँ कब तक श्याम सूंदर को पुकारती जाएगी ?

राधा रुक्मिणी गोपीयों के मन में भक्ति व्याकुलता और ईर्ष्या राधा न कर अपना जिया उदास चातक का मन भी भीगा भीगा सखी राधा वंशी को सौत अपनी।
इसकी मर्मस्पर्शी धुन में,क्या नहीं सुनती तू अपने मन की प्रतिध्वनि।
राधा के गहन अंतर्मन में छिपा सम्पूर्ण प्रेम वंशी की मनमोहनी हृदय-विदीर्ण स्वर लहरी अनोखा प्रेम।कोई भेद नहीं, त्रय ऐकौवंशी वंशी राधा राधा पुकारती पपीहे की पीहू पीहू मन से न हारसर्वत्र सृष्टि में तुम ही तुम हो दोनों
नहीं द्वै नहीं एक, एकाकारद्वै में एक, गूँजेगी सर्वत्र
वंशी में समाहित, राधा तेरी ही पुकार।यामिनि एक रसमय

बरसने में राधिका प्यारी अम्बुवा की डाली
श्याम सावला राधिका गोरी युगल छवि में बलिहारी
वृंदावन ,गोकुल ,मथुरा कोई नगरीय न छोर
॥सूर्य की किरणों की आकृतियाँ निर्मल; कोमल चंचल पवन घनघोर छटा
मौन भाव चीन्हहिं कान्हा जब लखि राधिका कान्हा को प्रथम बार
द्रवित ह्रदय में छिपे तरल विचार सलज्ज दृगों में तैरने लगे बारंबा
देवदारबहुल पहाड़ बौछार के पीछे चाँद की किरणो
किधौं मुख कमल ये कमला की ज्योति होति,
किधौं चारु मुख चंद चंदिका चुराई है।

किधौं मृग लोचनि मरीचिका मरीचि किधौं,
रूप की रुचिर रुचि सुचि सों दुराई है॥
सौरभ की सोभा की दसन घन दामिनि की,
'केसव' चतुर चित ही की चतुराई है।
ऐरी गोरी भोरी तेरी थोरी-थोरी हाँसी मेरे,
मोहन की मोहिनी की गिरा की गुराई है॥
चाँद देखू या चित्तचोर देखूँ
नैनं मेँ समाया सारा जहाँ राधा
तुझसे ही प्रेम का मान राधा
तू ही बता राधा किस ओर देखूँ
NEWYORK USA- KATHAK BOLLYWOOD INDIAN DANCE SONG QUEENS REGISTRATIONS " January 2017 ..E:kathak.org@outlook.com WWW.PIAMAJUMDAR.COM / PIA BHATT KATHAK QUEEN FROM KOLKATA INDIA- MOTIVATING PERSONALITIES TO PERFORM:)


​NAYIKA RADHA 
 ब्रज की नायिका 
ब्रज की नायिका के रूप अपार निर्मल कोमल चंचल भती मोहोब्बत जैसी
लाल गुलाबी गुलाब का फूल बिखरे पतझर के भीतर 
निर्मल काटो से भरी आज लिख बैठी एक पाती अपने पिया को
गमक उठी सोंधी-सोंधी महकती धराशोभित ओस-बिन्दु,सजल नयन सम
प्रात: मृदुल किरणों का सुनहरी अबीर ले राधा रानी दे दो अपनी तनिक सी चरण-रज।
झंझावातों से जब हो रहा जीवन अशांत अंधकार में बुझता आस-दीप,मन क्लांत
ब्रज की नायिका कदमभ के वृक्ष संध्या पूजा की थाली माला गूंती ख्यालो में मग्न 
ब्रज की नायिका अनेक रंग बिरंगी घाघरा चोली अंगुढन चुंधियाना
ब्रज की नारी सोना हीरा चांदनी गहने बॉक्स गले में पहने मोतियन माल 
ब्रज की नायिका मोहोब्बत ख्याल गुफ्तगू पी के बारे में कर रही हैं मुझसे
बुद्धि शांति दिव्या रुपी शक्तिशाली माँ जगदम्बे जैसी प्रवीणता
ब्रज की नायिका बालों में बाल रोटी ,चंदन केसर मुखर पर मुस्कान बैठी मग्न 
ब्रज की नायिका सरस्वती, गंगा, तुलसी तुम दिव्यशक्ति सब भाँति अनूप अनेक रूप 
ब्रज की नायिका स्वाहा, स्वधा, षष्ठी दक्षिणा, मनसा, पुष्टि, तुष्टि हो स्वस्ति।
करुणा-सुधामयी देवी! तुम परम मनस्विनि, अमित उदार।
राधा-रूप-चरण-रज दे निज करो तुरंत कृपा-विस्तार
मूलप्रकृति राधा तुम, दुर्गा, लक्ष्मी, शुभ सावित्रीरूप।
भाव-विभोर,दृग-अश्रु-बिंदु,अलौकिक प्रकाश महिमा अपार निहित तुम्हारी चरण-रज

ABHILASHA 
​मन के आईने में तुझे देखू साँवरिय दिन रैन मन मोहन की यादों में बीती बावरिया
प्रेम पाती डाक बुलाकर पिया प्रियतम को भेजु 
 पिया की आस सतावे मन का भ्रमर उदास आँखों का सूरमा सूखी ललचावे
श्याम न आवे मन मंदिरवा सतावे पिया को लिख बैठी प्रेम पाती
कुहक कुहक काही रे कोयलिा चहुँ दिशा ऐसे कोयल की कुहक कुहक गूंजे 
चाहा रे सवारियांजो डाक बटोहिया पचरंग चोला पहिर सखीरी, झुरमुट खेलन जाती।
झुरमुट में मोहि मिलियो साँवरो, खोल मिली तन गाती।
कोई के पिया परदेस बसत हैं, लिख-लिख भेजत पाती।
मेरे पिया मेरे घर में बिराजे, बात करुँ दिन राती।
सुरति निरति का दिवला सँजोऊँ, मनसा की करलूँ बाती।


CHER CHAAD 
मोर मुकुट की देख छटा मैं हो गई सजनी लता पदा
मैं जल जमुना भरन जात री, मार्ग रोकत नाहीं हटा।
हाथ पकड़ मेरी बइयाँ मरोड़ी, बिखर गया मेरा केश लटा।
 दधि बेचन बइयाँ पड़क मेरी मटकी फोड़ी, बिखर गया मेरा दही मठा।
सास ससुर मोहे बुरी बतावे, नणदल बोलत बचन खटा।
सखियन में मेरा मान घटा।
घुँघरवाले बाल श्याम के, मानो जैसे इन्द्र घटा।
राधा कृष्ण रटा रटा।


​Shiv Tandav Strotram Sung In Melodius Voice Debashish Sarkar 
हर हर महादेव बम बम भोले कैलाश मानसरोवर के ऊपर का नजारा आप देखकर हैरान हो जाएंगे 
कुदरत द्वारा बनाया गया शिवलिंग भगवान भोलेनाथ यहा पर साक्षात विराजमान हैं...
मानसरोवर कैलाश पर्वत में शिव भक्ति प्रसंग वर्णन, चित्रलेखन 
त्रिलोक ब्रह्मा विष्णु महेश शिव पारवती युगल जोड़ी सरकार 
शिव रुद्राक्ष भयंकर भुजंग भाव शिव की महिमा अपार 
किशोरी चन्द्रशेखर गंगोत्री जटाधारा शिव की ताल डमरू बेमिसाल 
मानसरोवर कैलाश पर्वत में हनुमान चालीसा या शिव स्तुति सत्संग 
शिव का वर्णन नीलकंठ कंधई जटाधारी भुजाओं किशोरावस्था तरूणता

​वृंदावन की रचनाएं-भर्ती 21राधे राधे 
वृंदावन के कुञ्ज कुटियन में झूला झूलत नन्द किशोरी जु 
मधुवत कमकृदना मधुर मीठी चांदनी रात में चन्द्रमा 
कृष्णा की मधुर बांसुरी की ध्वनि तितलियाँ भवरें जड़ित मणिखम्बित दऊ
झूला झूलत नन्द किशोर की तिरछी नजरिया  
लाल गुलाबी सफ़ेद रंग के फूल झूला को लिपटी रास रचत ब्रज में नंदलाला 

​VRINDAWAN BHAKTI POEMS 
POST UR POEMS kathak.org@outlook.com
 कुमुदिनी ह्रदय लतापता वृक्ष की डाली निराली
रसाधार ब्रज की प्रेम पिपासा अभिलाषा निरन्तर हरियाली
यमुना के तीर मंद गज की चाल गजगामिनी
सखी ऋ :आज आवे न श्याम बीती सारी उमरिया
कबहुँक सखी गीत सुनावत श्याम अविरत अंजोरी अनुसरण
भूषण मन मोहक फूल चुनकर पूजा चरावत वह बोलना, मिलना, चलना, मुस्काते हुए देखना शर्मीली नटखट चाल चलावत प्रीति की रीति, प्यार भरी चतुरता बार बार याद आ जाती है संध्या के समय श्यामसुंदर गायों के स साथ चरावत
देखत ग्वाल मुरली बेमिसाल नटवरी चाल ननदलाल 
राधिका गोरी श्याम सावले सरसंगीत “अंगुढन हटाके हमरी तरफ नजरिया तो करो”उस समय उनकी मनोहर छवि देखकर ऐसा प्रतीत होता था मानो सुंदरता रूपी आंनदमय अमृतमय समुद्र लहरा रहा हो और तरूणता (किशोरवस्था) रूपी तरंगे उसमें झलमल-झलमल कर रही हो श्यामसुंदर का एक एक अंग क्या था, मानो कामदेव की सेना हो धीरज बरबस छूट जाता थायमुना के तीर मंद गज की चाल गजगामिनी
सखी ऋ :आज आवे न श्याम बीती सारी उमरिया
कबहुँक सखी गीत सुनावत श्याम अविरत अंजोरी अनुसरण
भूषण मन मोहक फूल चुनकर पूजा चरावत
वह बोलना, मिलना, चलना, मुस्काते हुए देखना शर्मीली नटखट चाल चलावत
प्रीति की रीति, प्यार भरी चतुरता बार बार याद आ जाती है 
संध्या के समय श्यामसुंदर गायों के स साथ चरावत
देखत ग्वाल मुरली बेमिसाल नटवरी चाल ननदलाल 
राधिका गोरी श्याम सावले सरसंगीत
“अंगुढन हटाके हमरी तरफ नजरिया तो करोस्मृतियां सावन की 
श्यामसुंदर के नाच से बादल गरजा और मचाए शोर  
तन मन का मोर नाचा पायल की पैजनियाँ की झंकार 
असवारी के मन में व्याकुलता प्रेमिका अपने प्रियतम को पुकारी …….
महाभाव-रसराज-सिरोमनि दोऊ प्यारी-प्यारे पिया पुकारी मोहोब्बत की दो पंक्तियां लिख दो नित्य गायें चराने जाते हो, जो सदा मुरली निनाद से मुखरित रहता है, उस वन में निभृत निकुंजो में जो सर्वथा अब आकर मेरी श्रृंगार तो पूरा करो नंदकिशोरी "अंग-अंग ब्याकुल भई मुख, पिय पिय बानी हो।मूसलधार घटा लता पता सावन का मौसम बारिश की टिप टिप बूंदे बादल बिजुरी दमके बौछाड़ मूसलधार बारिश रिम झिम पानी टिप टिप बरसे हवा का ज़ोर झोका मोरनी अपने पंखुरी में हो गयी बांवरी दामिनी दमक चहुँ दिशा चितचोर ता ता ता दीघ दीघ थेई थेई बदरवा गरजा घनगोर

वृन्दावन के सुन्दर उपवन में फूल दरख़्त का बागीचा फूलो में काटो का चुभन 
लाल गुलाब का फूल दरख़्त पेड़ पौधे कभी खिखिलाना और मुरझाना प्रातःकाल 
एक ताज़ी खुशबू घुंघराले सुतली पेड़ों की छाल एक दुसरे पर लिपटी मुरझाई 
आंखों में चुभती दिल में कशमकश ए दिल खूबसूरत नज़ारो का बागान 
घनघोर बादल छटा पेड़ में पत्तियाँ रंग बदली बारिश की बूंदे दिल में मचाई शोर 
हवा का झौका झील के किनारे प्रेम वार्तालाप कशमकश दिल की सदा अरमान 
वृक्ष में काली घनघोर बादल एक निकुंज स्थान कृष्णा राधा का हाथ थाम 
सुन्दर स्थान में पधारे वृंदावन धाम राधे कृष्णा की अधबुद्ध लीला - 08/22/16 

Bhakti 1 - "कान्हा में एक खूबी तो ज़रूर थी वो अभिमानी नाही थे राधे राधे" !
वृंदावन में ब्रजमंडल संध्या के समय सब ग्रामीण भोजन करने को बैढे, 
कान्हा नटखट सखाओं को कहानियाँ सुनाते चले जा रहे थे. भोजन में समोसा 
जलेबी और तरह के स्वादिष्ट पकवान खा कर मस्ती मार रहे थे अचानक सुंदरी राधे 
और सखियाँ बाए तरफ से
 नदियाँ में मटका लिए जा ही रही थी........
 की कान्हा उनके मटके कंकरी से फोड़ना चाहते थे 
 और मटका फोड़ दी सारा पानी उनके कपड़ो को भिंगा दिया ............ 
राधा घूम कर बोली "आज कन्हो सताओ नाही हमरी रास्ता छोड़ो "वो बहुत 
परेशान थी की कान्हा को इतना सतनए की क्या आवश्यकता हैं ?-
कान्हा ने जवाब दिया "हमरी प्रेमिका को धीरे से वश में कर रहे

वृन्दावन के सुन्दर उपवन में फूल दरख़्त का बागीचा फूलो में काटो का चुभन 
लाल गुलाब का फूल दरख़्त पेड़ पौधे कभी खिखिलाना और मुरझाना प्रातःकाल एक ताज़ी खुशबू 
घुंघराले सुतली पेड़ों की छाल एक दुसरे पर लिपटी मुरझाई 
आंखों में चुभती दिल में कशमकश ए दिल खूबसूरत नज़ारो का बागान 
घनघोर बादल छटा पेड़ में पत्तियाँ रंग बदली बारिश की बूंदे दिल में मचाई शोर 
 हवा का झौका झील के किनारे प्रेम वार्तालाप कशमकश दिल की सदा अरमान 
वृक्ष में काली घनघोर बादल एक निकुंज स्थान कृष्णा राधा का हाथ थाम 
सुन्दर स्थान में पधारे वृंदावन धाम राधे कृष्णा की अधबुद्ध लीला 


BHAKTI 2 - राधे श्याम चरणस्पर्श स्थान 
मुरली गिरिधर नंदलाला गोकुलवाला
रोमांटिक कान्हा मधुबन में राधिका के पीछे परे थे 
कान्हा नटखट चतुर श्याम सुंदर गोपियों के साथ 
समय व्यतीत करते थे पर राधिका के पीछे परे थे.........
राधा में ऐसी कुछ बात तो होगी जो माखन चोर कान्हा Roz उसके 
चरण स्पर्श छूते थे ?
राधा रानी महारानी सबसे गुणी
माखनचोर वाला नटखट नंदन हर दिन एक नयी गोपीचाल खेलते थे 
यह नील रंग का श्यामसुंदर वृंदावन के इस उपवन शांति र्वक स्थान में विराजमान थे 
राधा गोपियाँ सखियाँ परी स्नान कर स्वछ होकर  
 लाल हरी नील रंग की चोलियाँ पहन के हरी की एक नज़र के लिए तरस रही थी .......
कृष्णा के निकट आये श्रृंगार करते समय एक दुसरे के तरफ देखती चली जा रही थी. 
कान्हा के प्रति भक्ति तो थी मगर वे उनमे से सिर्फ एक ही कान्हा को मोहना चाहती थी
सब एक दुसरे से जलते थे सारी गुणी थी कोई वीणा कोई भजन संगीत 
 अब कान्हा किसको चुने ?
नटखट मथुरा के कान्हा सब की रंग बिरंगी चोली के संग आँख में चोली खेल रहे थे 
लेकिन अंत में वो राधे रानी ब्रज की महारानी को बाये बिठाकर ही अपने ह्रदय के सबसे करीब रखते थे ......
राधा रानी की लीला सर्वश्रेष्ठ
वृंदावन के जंगल में नव पल्लव पुष्पक पेड़ की डाली निराली
सूर्य की किरण प्रकृति इंद्रनील प्रातःकाल चातक की मीठी सुरीली ध्वनि कोयल की कुहुक कुहुक
“ओ कान्हा पीताम्बर ओड़ी मुरली नंदन छेड़ो नाहीं मुझे” गोपिनन ब्रजवासी प्रतिपल
मुकुट पितम्भर सुहे धनु चरावे मोहन मुरली वाला श्रृंगार में तर धुंध और मधुर परिपूर्णता का मौसम
परिपक्व सूरज की बंद छाती फल के साथ लताओं दौर है कि छप्पर-महिला खिलाड़ी चलाने
सेब कुटीर-पेड़ के साथ मोड़ करने के लिए, कोर करने के लिए सिद्धता के साथ सभी फल भरने
कविताएं शिल्पी लाल गुलाबी गुलाब का फूल बिखरे पतझर के भीतर की आकृतिया सिरञ्जनहर
जीवन कला हैं नृत्य या प्रभु की सेवा मौसमी बसंत में ललिता
ऋतू भगवान की श्रिष्टि भक्ति रंग बिरंगी पत्तियाँ फूलों की डाली निराली

BANSI VALA NAND DULALA

कालिंदी-तट नित्य निहारौं अश्को 
बंसी मुरली -तान मनोहर सुनि सुधि सकल बिसारौं
पल-पल निरखि झलक अँग-अंग पुलकित तन मन वारौ
होली आई होली आई सफ़ेद साडी पहन गोरियों को रंगीन बनाई 
श्याम गोपियॉं संग खेले पिचकारी लाल गुलाबी नील रंग बिरंगी मुखर पर शर्म लाई 
औस की बूंदे रीझे टिप टिप बरसी कोकिल पखारू बनाई 
श्याम गोपियों संग रास रचाई ...........
झुरमुट में मोहि मिलियो साँवरो, खोल मिली तन गाती।
कोई के पिया परदेस बसत हैं, लिख-लिख भेजत पाती।
मेरे पिया मेरे घर में बिराजे, बात करुँ दिन राती।
सुरति निरति का दिवला सँजोऊँ, मनसा की करलूँ बाती।
अगम घाणी से तेल कढ़ाऊँ, बाल रही दिन राती
अँखियाँ रसीली टोरी श्याम रास भरे तोरे नैन
मोहोब्बत की शाम ए महफ़िल कवाली सरेआम


Ghunghroo-Vrindawan Bhakti 17 
SAWARIYA - चल ऋ सखी आज ब्रजनगरी में महामेला की सजावट देखे
फूलों से सजी रंगमंच इतने सारे दर्शक उम्मीद लेकर बैढे हैं
उस घडी की जब कृष्णा राधा एक संग नाचेंगे ठुमरी गाएगे प्रदर्शन
घुँघरू की झनकार चांदनी पायल ने मचाई शोर
घुँघरू की झंकार से गूँज उठा सावन भादो घनघोर
इत नटखट श्याम की भक्ति उत राधिका की चाल
पैरो में गंठ बंधाया ,नृत्यकि पलटा पलटी
कण कण उनकी जोड़ी रहे सलाम सार्वजनिक अवाक
कुछ टुकड़े कुछ फरमाइशी चक्रधार ऐसी दिव्या दृष्टि कौन देख पाए
केवल मोहिनी आकाशीय देश ब्रजनगरी में

KRISHNA VANDANA 
कृष्णा वंदना/ KRISHNA vandana -#59
कृष्णा फिलोसोफी-६२ 
यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिभवती भारता
धर्म संस्थापनधरय सम्भवामि युगे युगे 
करमंडका वाधिकारस्ते माँ फलेषु कदाचना 
महाभारत में कुरुक्षेत्र कौरव पांडव की सेना में युद्ध 
वासुदेव श्री कृष्णा ने ड्रोन कुंती पुत्र अर्जुन से कहा की 
"शत्रिय धर्म का पालन करो जीवन में हार जीत 
सुधि बुद्धि संकल्प विलकलप विजय पराजय चलता रहेगा 
मनुष्य को अपना कर्म और धर्म पालन करना चाहिएइ 
फल की आशा न करे कर्म अपने आप में फल हैं ...........
युद्ध करके वीरगति की प्राप्ति क्षत्रिय कर्त्तव्य मानव धर्म व्यवहारिक कर्म !
भजे ब्रिजयका मन्दनम् समस्त पाप खंण्डनम्
स्वभगत छित रंजनम सदैव नन्द मंनदनमसुपीक्षा गोछ मसतकम 
सुनाद वैणनु हस्तकम अलनकां रंग सागरमनमामी कृष्णा नागरम